जाएं तो जाएं कहां
ज़िंदगी के छटे दशक के आखिरी पड़ाव
को पार करते नींद का सुबह चार और पांच बजे के बीच
खुल जाना अब रोज का नियम बन चुका था। घर के और सभी लोग सो रहे थे। लिहाज़ा चुपचाप
उठ कर बाहर बाल्कोनी में जा के देखा तो मौसम और हवा दोनो पिछले दिन ज्यादा साफ थे।
दिल्ली में नवंबर मास के शुरू में यह एक वरदान जैसा लगा। उम्मीद ही नही विश्वास था
धुएं से भरे वातावरण का। कल ही तो हवा का क्वालिटी इंडेक्स 450 था और सरकार ने और अपनी तरफ से और अपनी समझ से कुछ कदम उठाए वातावरण को
काबू में रखने के लिए। लेकिन आज तो मौसम विभाग के अनुसार दक्षिण पूर्वी हवा ने कुछ
राहत दी । प्रदूषण को एक कैटेगरी तो कम कर ही दिया होगा इसने।
सोचा क्यों ना इसका फायदा लिया जाए
सुबह की सैर करके। हल्की ठंड में अपनी जैकेट पहन के निकलते ही याद आया कि एक डंडा
हाथ में लेना अच्छा होगा। क्या पता कौन सा कुत्ता किस मूड में हो ? जानवर भी तो 450 इंडेक्स की प्रदूषित हवा से परेशान
होंगे। फोन पर एक रेडियो का सुबह का संगीत प्रोग्राम चला दिया था और भी मूड को ठीक
बनाने के लिए।
बाहर कॉलोनी में अभी इक्का दुक्का
लोगों के इलावा कार साफ करने वाले कुछ लड़के अपने कामों में लगे हुऐ थे। क्यों ना
आज सामने की कॉलोनी के डीडीए के बड़े पार्क में चला जाए? यह सोच कर कदम उस तरफ बढ़ा दिए। दोनो कॉलोनी के बीच में जो बड़ी आठ लाने
वाली ट्रैफिक सड़क इस समय लाल बत्ती चौराहे से पार
करनी मुश्किल नहीं होगी।
सड़क पर डीटीसी दो तीन बसों के अलावा
कुछ सुबह की उड़ानों के लिए एयरपोर्ट जाने वाली कारें थी। मौसम मे हल्की ठंडक थी। अपनी ही उम्र के कुछ और लोग भी थे, कुछ
जानकार कुछ पहचाने पर और कुछ नहीं ।
सड़क पर आते ही नजर पड़ी एक छोटे
ट्रक पर जो लोकल छोटा समान ले जाने के काम आता है और जिसे तीन ट्रैफिक पुलिस के
कांस्टेबल घेर के खड़े थे। इस सड़क पर दिन के समय या मध्य रात्रि में यह कोई नया
नहीं था। पर इतनी सुबह यह सीन देखने का मौका
पहला था। लगा शायद रात का काम संतोषजनक नहीं रहा होगा।
ड्राइवर के चेहरे के भाव से लगा की
आज कुछ दाल में ज्यादा कला है। पुलिसवाले बार बार चालान काटने का एक्शन करते दिख
रहे थे। आखिर चालान कट गया और ट्रक ड्राइवर एक साइड में चाय पीने चला गया। हमे भी
न जाने क्या सूझी की चाय पीने बैठ गए । ट्रक ड्राइवर का नाम प्रकाश था।
अरे साहेब अपने धंधे में इन लोगों से
मिलना टकराना तो अक्सर होता है। हफ्ता दिए बिना तो एक कदम भी नहीं चल सकते। पर आज
तो बात ही कुछ और हो गई। कहने लगे कि तुम्हारी चार साल पुरानी डीज़ल की गाड़ी
सरकार ने कल शाम से परमिशन रोक दी बढ़ते प्रदूषण पर कंट्रोल के लिए। साहेब दो साल
की महामारी की कर के बाद अब थोड़ा बहुत कम मिलना शुरू हुआ था । मुश्किल से ट्रक के
लोन की किस्त और रख रखाव और ट्रांसपोर्ट और पुलिस के हफ्ते के बाद जो बचता है उसमे
चार लोगों कर परिवार चलता है। डीज़ल की कीमतें भी आसमान छू रही हैं और काम का
कंपटीशन रेट और काम का मिलना ज्यादा बढ़ने
नही देता। बहुत मुश्किल से चलता है। हर महीने कुछ न कुछ कम पड़ जाता है। चालान
बढ़ने के बाद हफ्ते का रेट बहुत ज्यादा बढ़ गया है। अब हफ्ता गलत काम का नही ,
काम के लिए मार्केट में बने रहने के लिए देना पड़ता है। गलत काम का
रेट अलग होता साहेब।
इन सब के बाद आज तो बहुत बड़ा चालान
काट दिया इन लोगों ने। कहने लगे सरकार के आदेश के साथ काम करना पड़ेगा। अब तो छह
महीने और मुश्किल में कटेंगे । एक बात समझ में नहीं आई। हमारे पास ट्रांसपोर्ट का
फिटनेस सर्टिफिकेट और पी यू सी दोनो तो है । कल सुबह तक तो यह ट्रक
ठीक था तो 12 घंटों में यह पॉल्यूशन फैलाने वाला कैसे बन गया? जैसा मैंने सुना
और पिछले कईं सालों से देख रहे हैं की इन दिनों में पंजाब हरियाणा में
धान की पराली जलाने से धुआं पूरे उत्तर भारत का प्रदूषण बढ़ाता है
इन दिनों मे। पर ये तो मेरा कसूर नहीं है ना। किसी के गलत काम की वजह मेरी रोजी
रोटी क्यों बर्बाद हुई ? मैं जैसा कल था वैसा ही आज भी हूं
और वैसा ही रहूंगा। परिवार के लिए मेहनत कानून के तरीके से और हफ्ता दे कर
करता रहूंगा । क्या फिर भी सरकार का जब मन चाहे तब बिना किसी बदलाव
के अचानक ही कसूरवार बना कर सजा दे दी जाएगी ?
कोई जवाब न दे पाने की
हालत में मैंने चुपचाप खड़ा हो घर वापस
चलना ही मुनासिब समझा । रेडियो पर तलत महमूद की आवाज़ में गाना चल रहा था – जाएं
तो जाएं कहां समझेगा कौन यहां दिल की जुबां – । कुछ
याद आया यह गाना भी तो फिल्म टैक्सी ड्राइवर का था। साहिर ने कितने सटीक तरीके से
एक छोटी गाड़ी से रोज कमाने वाले ड्राइवर की मन की बात
तब लिखी थी। पर बात में सिर्फ बेबसी के अलावा कुछ नहीं।
NAVEEN KUMAR BANSAL
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